From Bedridden to Walking: A TB Recovery Story of Hope, Nutrition, and Human Support

From Bedridden to Walking: A TB Recovery Story of Hope, Nutrition, and Human Support

“बिस्तर से उठकर चलने तक: टीबी से जंग की एक प्रेरणादायक कहानी”

यह कहानी एक ऐसी महिला की है, जो हमारे AMGASI Clinic से लगभग 15 किलोमीटर दूर एक पहुँचविहीन क्षेत्र में रहती हैं। वे पहली बार 10 जुलाई 2025 को हमारे अस्पताल में इलाज के लिए आई थीं।

पहली जाँच और निदान
अस्पताल में उनका नाम, पता और सामान्य जानकारी दर्ज की गई। उनकी ऊँचाई और वजन की जाँच में पता चला कि वे बहुत गंभीर कुपोषण (Very Severe Undernutrition) से पीड़ित थीं। पिछले 2-3 महीनों से उन्हें लगातार बुखार, पूरे शरीर में दर्द, वजन कम होना और भूख कम लगना जैसी समस्याएँ थीं। उनकी स्थिति इतनी कमजोर हो चुकी थी कि वे बिस्तर पर थीं और ठीक से चल भी नहीं पा रही थीं।

हमारी नर्सों द्वारा उनका Vital Check Up किया गया, जिसमें BP, Pulse, SPO2, Temperature और Respiratory Rate (RR) शामिल था। इसके बाद मरीज को डॉक्टर के पास दिखाया गया। डॉक्टर द्वारा टीबी की आशंका होने पर बलगम जांच और X-ray कराया गया। जांच में मरीज को टीबी और गंभीर एनीमिया (Severe Anemia) पाया गया।

आपातकालीन उपचार और रेफरल
हमारे छोटे अस्पताल में उन्हें RL तथा Antibiotics की बोतल चढ़ाई गई और टीबी की दवाइयाँ शुरू की गईं। लेकिन मरीज की स्थिति अत्यधिक गंभीर होने तथा मृत्यु का जोखिम होने के कारण उन्हें District Hospital Ambikapur रेफर किया गया। वहाँ खून की कमी के कारण उन्हें एक यूनिट रक्त भी चढ़ाया गया। इसके बाद उन्हें फिर से Sangwari Hospital बुलाया गया। उस समय भी उनकी तबियत पूरी तरह ठीक नहीं हो पाई थी।

बदलाव की शुरुआत: साप्ताहिक फॉलो-अप और घर तक सहयोग
फिर हमने उनके लिए Weekly Follow-up का प्लान बनाया। मैं स्वयं उनके घर जाकर उनकी स्थिति देखने लगा। धीरे-धीरे मैंने उनका दोस्त बनकर उनकी परेशानी और दुख को समझा तथा उन्हें प्रतिदिन इलाज, दवाई और पोषण के बारे में विस्तार से समझाया।

लगातार टेलीफोन के माध्यम से उन्हें अस्पताल बुलाया जाता रहा। किसी कारणवश अस्पताल नहीं आ पाने की स्थिति में उनके घर तक दवाइयाँ पहुँचाई जाती थीं।

धैर्य और सुधार
इन निरंतर प्रयासों और संगवारी द्वारा दिए गए पोषण आहार तथा नियमित दवाई सेवन से उनकी तबियत में धीरे-धीरे सुधार आने लगा। उन्हें बीच में पीलिया भी हुआ, लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और नियम अनुसार अपनी दवाइयाँ लेती रहीं।

नियमित इलाज और पोषण आहार के कारण उनका वजन लगभग 10 किलो बढ़ गया। जो मरीज पहले बिस्तर पर थीं, जमीन में घिसटकर चलती थीं, आज वे अपने पैरों पर चल-फिर सकती हैं और अपने घर का काम भी कर रही हैं।

इस कहानी से सीख
यह कहानी 10 जुलाई 2025 से 25 मई 2026 तक की है, जो यह दिखाती है कि सही समय पर जांच, नियमित इलाज, पोषण और मानवीय सहयोग से टीबी जैसी गंभीर बीमारी को हराया जा सकता है।

निष्कर्ष
इस मरीज की कहानी हमें यह सिखाती है कि टीबी जैसी गंभीर बीमारी का इलाज केवल दवाइयों से ही नहीं, बल्कि सही समय पर जांच, नियमित उपचार, पोषण आहार, निरंतर फॉलो-अप और मानवीय सहयोग से संभव होता है।

मरीज की स्थिति अत्यंत गंभीर होने के बावजूद, लगातार प्रयास, परिवार जैसा सहयोग, समय पर रेफरल, उचित पोषण और मरीज की स्वयं की हिम्मत ने उन्हें एक नई जिंदगी दी। यह कहानी बताती है कि यदि मरीज को सही मार्गदर्शन, विश्वास और सहयोग मिले तो टीबी जैसी बीमारी को भी पूरी तरह हराया जा सकता है।

यह केवल एक मरीज की सफलता नहीं, बल्कि सामुदायिक स्वास्थ्य सेवा, टीमवर्क और मानवीय संवेदनाओं की एक प्रेरणादायक मिसाल है।

-दाकेश पैकारा , टीबी कोऑर्डिनेटर, संगवारी

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