Sleeping on the ground

Sleeping on the ground

जमीन पर नींद

पिछले कुछ दिनों से क्लिनिक के मरीजो का फॉलोउप ठीक से हो नहीं पा रहा था | हमारी नर्सेस जितना हो सके फील्ड विजिट कर रही थी और फिर भी मरीजो की संख्या ज्यादा होने से फॉलोउप पुरे नहीं हो पा रहे थे | हमारे क्लिनिक के नर्स ने भी मुझे ये तक कह दिया की डॉक्टर भी होम -विजिट कम कर रहे है | मुझे शर्मन्दगी महसूस हुई |

संगवारी का अरगोती क्लिनिक, लखनपुर ब्लाक के आखरी छोर पर है | अरगोती फील्ड एरिया जंगल और पहाड़ से यात्रा के लिए थोडा कठिन भी है | पहाड़ी गाँव में बिच-बिच में जंगली हाथियों का डर भी बना रहता है | कभी-कभी हाथी के डर से पुरे गाँव को आंगनबाड़ी या स्कूल में 10-15 दिन रुकना पड जाता है | पहाड़ के निचले गाँव में अभी-अभी रस्ते बन है पर जंगल वाले रस्ते के कारन दिन डूबने के पहले क्लिनिक के साथी क्लिनिक लोट जाते है |

क्लिनिक में छोटी बीमारी के अलावा लम्बे बिमारि के लोग भी आते है | लम्बी बिमारि जैसे की हाइपरटेंशन, डायबिटीज, दिल के बीमारी, लकवा, मिर्गी, गठियाबात इत्यादी जिन्हें पूरा ठीक नहीं किया जा सकता बस नियंत्रित कर पते है | इन बीमारी की जानकारी और समझ भी गाव में कम है एस कारन मरीज दवाई कुछ ही दिन में छोड़ देते है| नियमित फॉलो उप और होमे-विजिट से मरीजो में जानकारी भी साझा होती है , साथ साथ हमारे है जैसे क्लिनिक में रहने वालो को भी मरीज के घर क्या हो रहा है, वो घर में कैसे रहते है , बीमारी के अलावा उन्हें और क्या परेशानी होती है ऐसे बहोत साड़ी जानकारी भी मिल जाती है | बिना ये सब जानकारी सही और संपूर्ण इलाज करना मुश्किल होता है |

नर्स का कहना मैंने सीरियसली लेलिया और अगले मंथली प्लानिंग में मैंने हर हफ्ते २ दिन अरगोती रहना का निर्णय लिया ताकि मै १-२ दिन सुबह से फील्ड घूम सकू और होम-विजिट भी बढ़ा सकू | अरगोती क्लिनिक के पीछे ही हमारे साथी सभिल-चंद्रभान रेंट पर रहते थे, उन्ही के साथी में दो दिन रहने का सोचा था | दोनों बहोत खुश थे |

अगले हफ्ते बुधवार OPD के दिन मै रहने के हिसाब से तयारी कर अंबिकापुर से निकला | दिन भर के OPD के बाद में सभिल-चंद्रभान के रूम पर पहुचा | घर में जाने की लिए एक खेत से जाना होता था | घर मिटटी का था और छत लकडी-कौला से बना था | जोर से हवा आती तो ऊपर से हलकी-हलकी मिटटी भी गिर जाती | रात में हम जमीन पर ही गद्दी बिछा के सो गए |

दुसरे ही दिन सवेरे पास के गाँव लालपुर की खबर आई | खटिया पर सोये दो बहने को करेत साप ने काट लिया और दोनों की रस्ते में ही मृत्यु हो गयी | उसी दिन हम जिस घर में रह रहे थे वही घर में भी साप निकला, घर मालिक के पीठ से गुजरा और दरवाजे कोने में जाकर चुप गया | मै साप काटने में कैसे इलाज करते इसका ट्रेनर था और जहरीले-बिना जहर वाले साप पहचनान जनानता था, इसलिए सभिल ने मुझे तुरंत बुला लिया | साप दरवाजे एक्छोर में ऐसा छुपा था की मै भी उसे ठीक से पहचान नहीं पा रहा था | सभिल ने मेरे आत्मविश्वास की कमी  को भापा और तुरंत उसे लाठी से मार दिया | सांप मरने के बाद मुझे समझा की वो बिना-जहर वाला कैट-स्नेक था |

दुसरे दिन के फील्ड विजिट के बाद हम शाम को वापस घर आये | शाम से ही मेरे मन में सांप का डर बना हुआ था | अक्सर करेत जमीन पर सोये लोगो अनजाने में काट लेता है, ये भय बार बार मेरे मन को परेशान कर रहा था | रात में जब हम सोने के लिए लेटे तो मेरा ध्यान छत की तरफ लगा हुआ था, बार-बार में इधर उधर झांक झांक कर देखे जा रहा था | भय के कारन में रात भर सो नहीं पाया | दुसरे दिन में सोच में डूबा था की में मेरे जैसे शहर में, पलंग पर सोने वाले लोगो को क्या पाता की गाँव में जमीन पर सोना क्या होता है | सांप के डर के बावजूद कैसे सोते होने जमीन पर लोग?

अगले हफ्ते मै मेरे लिए मच्छरदानी और छोटा पलंग ले आया |

– धीरज देशमुख

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