A Small Help, A Big Difference

A Small Help, A Big Difference

एक छोटी-सी मदद, एक बड़ा अनुभव (A Small Help, A Big Difference): A field visit to a Pahadi Korwa family in Madiyakona reminds us that sometimes the smallest acts of kindness make the biggest difference.

जुलाई माह के दौरान मड़ियाकोना गाँव के भ्रमण के समय मुझे एक ऐसा अनुभव हुआ, जिसने मुझे समुदाय की वास्तविक परिस्थितियों को और करीब से समझने का अवसर दिया। दिनांक 08/07/2026 को मैं मड़ियाकोना स्थित पोषण घर में गैस सिलेंडर के पाइप पर क्लिप लगाने गया था। कार्य पूरा करने के बाद मैंने आसपास के घरों का भी भ्रमण किया। इसी दौरान मेरी मुलाकात राजू पहाड़ी कोरवा से हुई।

जब मैं उनके घर पहुँचा तो वहाँ की स्थिति देखकर मेरा मन बहुत दुखी हो गया। बरसात के कारण घर के अंदर पानी भर रहा था और परिवार के सभी सदस्य उसी जगह पर खाना बनाते, खाते और सोते थे। राजू जी और उनकी पत्नी, जिनकी उम्र लगभग 60 वर्ष से अधिक है, अपने बेटे, बहू और पोते-पोतियों के साथ उसी छोटे से घर में रहते हैं। राजू जी की पत्नी को बहुत कम दिखाई देता है और स्वयं राजू जी भी एक आख में मोतियाबिंद का हो शायद पीलापन आ चूका है, अस्पताल दिखने के बाद उसका निदान होगा। उनकी उम्र, स्वास्थ्य और रहने की कठिन परिस्थितियों को देखकर मुझे लगा कि तत्काल कुछ सहायता करना आवश्यक है। मैंने उन्हें आश्वासन दिया कि मैं छप्पर को ढकने के लिए प्लास्टिक की पन्नी उपलब्ध कराऊँगा, ताकि बारिश के पानी से कुछ राहत मिल सके।

अगले दिन, 09/07/2026 को मैं अपनी सहकर्मी कमला के साथ पुनः मड़ियाकोना पहुँचा और राजू जी को प्लास्टिक की पन्नी उपलब्ध कराई। मैंने उनसे अनुरोध किया कि वे उसी दिन इसे छप्पर पर लगवा लें, जिससे वर्षा के दौरान घर के भीतर पानी कम आए। बातचीत के दौरान मुझे यह भी पता चला कि उनका दो वर्षीय पोता राजनाथ मड़ियाकोना के पोषण घर में आता है। यह जानकर खुशी हुई कि परिवार का छोटा बच्चा पोषण सेवाओं से जुड़ा हुआ है, लेकिन साथ ही यह भी महसूस हुआ कि परिवार अभी भी बुनियादी सुविधाओं और सामाजिक सहयोग से काफी वंचित है।

दिनांक 24/07/2026 को मैं एक बार फिर राजू जी के घर गया। वहाँ पहुँचकर देखा कि उन्होंने दी गई पन्नी को उसी स्थान पर लगाया था जहाँ से सबसे अधिक पानी टपकता था। यह देखकर संतोष हुआ कि हमारी छोटी-सी मदद से उन्हें कुछ राहत मिली। बातचीत के दौरान पता चला कि उन्होंने जुलाई माह का राशन अभी तक प्राप्त नहीं किया था। इसलिए मैं उन्हें अपने साथ असकरा स्थित राशन दुकान पर लेकर गया। वहाँ पहुँचने पर जानकारी मिली कि राशन दुकान की चाबी सरपंच अपने साथ नर्मदापुर ले गए थे। हम दोपहर लगभग 1:25 बजे से शाम 5:00 बजे तक लगातार इंतजार करते रहे। सरपंच के लौटने के बाद ही दुकान खुल सकी और अंततः राजू जी को उनका राशन मिल पाया।

राशन मिलने के बाद मैं स्वयं राशन उनके घर तक पहुँचाने गया। इस दौरान मुझे यह भी पता चला कि उनका बेटा शराब की लत के कारण अपने वृद्ध माता-पिता के लिए राशन लेने नहीं जाता है। जब मैं राशन लेकर उनके घर पहुँचा तो उनकी बहू बाहर आकर राशन ले गई। इस पूरे अनुभव ने मुझे यह एहसास कराया कि दूरस्थ आदिवासी क्षेत्रों में रहने वाले कई बुजुर्ग केवल आर्थिक कठिनाइयों से ही नहीं, बल्कि पारिवारिक उपेक्षा, स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं और बुनियादी सुविधाओं के अभाव से भी संघर्ष कर रहे हैं।

इस अनुभव ने मुझे यह महसूस कराया कि समुदाय में कई ऐसे परिवार हैं, जिन्हें छोटी-छोटी जरूरतों के लिए भी सहयोग की आवश्यकता होती है। समय पर की गई छोटी-सी मदद भी किसी परिवार के लिए राहत का कारण बन सकती है। यह अनुभव मेरे लिए केवल एक फील्ड विजिट नहीं था, बल्कि समुदाय की परिस्थितियों को समझने और उनके साथ संवेदनशीलता से जुड़ने का एक महत्वपूर्ण अवसर था। ऐसे अनुभव मुझे यह प्रेरणा देते हैं कि समुदाय के सबसे कमजोर और वंचित परिवारों तक पहुँचकर उनकी आवश्यकताओं को समझना और उन्हें उपलब्ध संसाधनों एवं सेवाओं से जोड़ना ही हमारे कार्य का सबसे महत्वपूर्ण उद्देश्य है।

– Ramkumar, Field Worker, Kuniya Cluster

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