Where Health, Education, and Food Are Out of Reach

Where Health, Education, and Food Are Out of Reach

फील्ड डायरी: जहाँ स्वास्थ्य, शिक्षा और खाना तक पहुँच मुश्किल है

मैं एक गाँव में फील्ड सर्वे के लिए गई थी, जहाँ कंवर, मझवार, पंडो समाज के लोग रहते हैं। जब हमने उनसे उनके बारे में पूछा, जैसे उनकी पढ़ाई कहाँ तक हुई है, वे किस धर्म को मानते हैं, बच्चे आंगनवाड़ी जाते हैं या नहीं, और उनकी उम्र कितनी है—तो कई समस्याएँ सामने आईं ।

ज़्यादातर लोग अपने बच्चों को आंगनवाड़ी नहीं भेजते हैं। उनका कहना है कि आंगनवाड़ी सड़क के किनारे है, बच्चा सड़क पर भाग सकता है, इसलिए बच्चों को आंगनवाड़ी भेजने में डर लगता है। स्कूल नही जा पाते बड़े बच्चे क्यूंकि उनके मम्मी- पापा जंगल चले जाते है और उनको उनसे छोटे बच्चे का देख रेख करना होता है घर पे । अगर बच्चे हॉस्टल में रहते हैं तो छुटियों में घर नही आते, जिनकी सुविधा उनको हॉस्टल में मिलता है वो घर पे नही मिल पाता ।

कई लोग अपनी सही उम्र नहीं बता पाते हैं। सरकार ने पीडीएस राशन लेने के लिए मोबाइल होना ज़रूरी कर दिया है। जिन लोगों के पास पैसे नहीं होते, वे भी पीडीएस राशन लेने के लिए मोबाइल खरीदने के लिए उधार लेते हैं।

वे यह भी साफ़ तौर पर नहीं बता पाते कि वे किस धर्म को मानते हैं। गाँव में शौचालय की समस्या है और पीने के पानी की भी भारी कमी है। पास में कोई अस्पताल नहीं है। एम्बुलेंस या किसी दूसरी गाड़ी तक पहुँचने के लिए जंगल पार करना पड़ता है। सड़क न होने के कारण बीमार लोगों को अस्पताल तक पहुँचने में बहुत परेशानी होती है।

आदिवासी जनजाति के लोगों की आजीविका के मुख्य साधन मछली पकड़ना और जंगल से छोटे वन उत्पाद इकट्ठा करना हैं, जैसे साल, महुआ, गोंद, तेंदू पत्ता, आंवला, हर्रा, बहेड़ा आदि। बरसात के मौसम में वे जंगल से कुछ जड़ें, जंगली मशरुम पत्ते और सब्जियाँ भी इकट्ठा  करते हैं। ठण्ड की दिनों में आजकल के समय में देखने को मिलता है, हरे सब्जीदार पत्ते को सुखाया जाता है, जिसको सुकती बोलते हैं. बारिश के समय में या कभी भी जब सब्जी नहीं मिलता है ये सुकती बनाकर खाते हैं सब्जी की जगह. गाँव में जो सब्जी खाने को मिलता है ठण्ड के समय – मूली का साग, पत्तागोभी, आलू, मटर, फूलगोभी, पालक, मेथी, लाल भाजी, भतुवा साग, सेमी, बैगन, टमाटर I

आजकल वे खेती भी करते हैं, लेकिन बहुत पुराने और साधारण तरीकों से। उनके पास खेती के लिए बहुत कम जमीन है और वे खेतों में मजदूरी का काम भी करते हैं।

संस्कृति के रूप में यह जनजाति बहुत रोचक है, लेकिन यह बहुत अलग-थलग और धीरे-धीरे खत्म होती जा रही जनजाति है।  कई बार इन्हें दिन में एक समय का भोजन भी ठीक से नहीं मिल पाता। अत्यधिक गरीबी और सरकारी योजनाओं का सही लाभ न पहुँच पाने के कारण, इस समुदाय की महिलाओं और बच्चों में कुपोषण की समस्या बहुत अधिक है।

सरगुजा के गाँव में ज्यादातर देखने को मिला ,आदिवासी समाज में  लोग  धुकू रहते  हैं I धुकू” शब्द सरगुजा क्षेत्र में प्रचलित एक  सामाजिक-सांस्कृतिक शब्द है। इसका मतलब होता है जब लड़का और लड़की एक-दूसरे को पसंद करते हैं, बिना औपचारिक शादी किए, पति-पत्नी की तरह साथ रहने लगते हैं, यह रिश्ता गलत या अपराध नहीं माना जाता, अक्सर यह शादी से पहले  होता है, अगर दोनों साथ निभा लेते हैं, तो बाद में सामाजिक रस्म के साथ शादी भी कर लेते हैं, अगर रिश्ता न चले, तो बिना बड़े सामाजिक विवाद के अलग हो सकते हैं. 

ज़्यादातर परिवार अपने माता-पिता से अलग रहते हैं, ये देखा गया है I गाँव में  पलायन भी करते  हैं। वे अपने गाँव में ही या अंबिकापुर तक जाकर काम ढूँढते हैं। पलायन तभी करते हैं, जब उनके गाँव में खेती करने के लिए ज़मीन नहीं होती। तब वे ईंट बनाने जैसे काम के लिए गाँव छोड़कर चले जाते हैं।

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– Bharati Paikra

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